शनिवार, 11 सितंबर 2010

संजा है निमाड़  की लाडली बेटी - कवर माह  पितरो के आमद के साथ शुरू होता है संजा का पर्व निमाड़ व् मालवा की किशोरी बालिकाए शाम के समय जब सूरज का अस्ताचल होता है और रात की शुरुआत होती है तुब मानती है ये चित्र और गीत पर्व है जिसमे सभी बालिकाय इक्कट्ठा होकर संध्या के समय घर घर जा कर गाना गति है और  दीवार या पात पर बनाये गयी आकृति की पूजा करती है  आकृति  गाय के गोबर से बनायीं जाती है आकृति बनाने का दिन भी निश्चित होता है सोलह दिन तक ये पर्व मनाया जाता है फिर आखरी दिन सभी आकृतियों को नदी में विसर्जित कर दिया जाता है. संजा के गीत बड़े निराले है संजा एक लड़की है जिसकी अभी अभी शादी हुई है वह नव विवाहिता ससुराल से मायके आई है अपनी सखी सहेलियों से मिलती है और फिर विदा हो जाती है. गीत में कहते है ---संजा सहेलडी बजार में रमे बजार में घुमे वा काना जी नि बेटी वो खाय खाजा रोटी पठानी चाल चले राजवादी बोली बोले संजा एडो एडो संजा के माथे बेडो बेडो  ......ऐसे कई गाने है बाकि गाने बाद में  ...तुम बठो हम चल्या  राम राम 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें